कांग्रेसी किला तब्दील हुआ शिवसेना के मजबूत गढ में


प्रतिनिधि/दि.१५ अमरावती-वर्ष १९५१ में आजादी पश्चात हुए पहले संसदीय आम चुनाव से लेकर वर्ष १९९१ तक अमरावती संसदीय सीट पर वर्ष १९८९ के आम चुनाव को छोडक़र लगभग सभी चुनावों में कांग्रेस अपने दम पर जीतती रहीं. वहीं वर्ष १९९४ के चुनाव से लेकर अब तक कांग्रेस को यहां एक अदद जीत के लिए प्रतिक्षा करनी पड़ रहीं है. वहीं गठबंधन के तहत विगत पांच संसदीय चुनावों में कोई भी चुनाव कांग्रेस के पंजा चुनाव चिन्ह पर अमरावती संसदीय क्षेत्र में नहीं लडा गया. बता दें कि, फिलहाल अमरावती संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व शिवसेना की ओर से सांसद आनंदराव अडसूल कर रहें है, जो वर्ष २००९ के संसदीय आमचुनाव में भी अमरावती लोकसभा सीट से विजयी रहे थे. और अब वे लगातार तीसरी बार चुनाव का सामना करने के साथ ही अमरावती लोकसभा सीट से जीत की हैट्रिक लगाने हेतु भी तैयार है.

आगामी लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही अमरावती संसदीय सीट पर चुनाव का काऊंटडाऊन भी शुरू हो चुका है, य्योंकि यहां पर आगामी १८ अप्रैल को मतदान होना है. अत: कहा जा सकता है कि, आगामी एक माह का समय पूरी तरह से चुनावी माहौलवाला रहेगा और प्रत्याशियों की घोषणा व नामांकन प्रक्रिया पूरी होते ही सर्वत्र प्रचार की धूम रहेगी. ऐसे में इसके पहले की अगले चुनाव को लेकर राजनीतिक समीकरणों का बनना और बिगडना शुरू हो, अमरावती संसदीय सीट पर अब तक हुए हार व जीत के समीकरणों एवं नतीजों पर सिंहावलोकन करना तो बनता है. सबसे पहले बात वर्ष २०१४ में हुए लोकसभा चुनाव की, जिसमें शिवसेना प्रत्याशि आनंदराव अडसुल ने राकांपा की उम्मीदवार नवनीतकौर राणा को १ लाख ३७ हजार ९३२ मतों से पराजित किया था. उस साल आनंदराव अडसूल को यहां पर ४ लाख ६७ हजार २१२ वोट मिले थे और नवनीत कौर को ३ लाख २९ हजार २८० वोटों पर संतोष करना पड़ा था.

यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि, वर्ष २००९ के लोकसभा चुनाव में सेना प्रत्याशि आनंदराव अडसूल ३ लाख १४ हजार २८६ वोट लेकर विजयी हुए थे. वहीं उन्होंने वर्ष २००९ की तुलना में वर्ष २०१४ में हुए चुनाव में १ लाख ५२ हजार ९२६ अधिक वोट हासिल किए थे. सांसद अडसूल द्वारा दो चुनावों के दौरान हासिल की गई इस बढत को मोदी लहर का नतीजा माना गया था.

अमरावती लोकसभा सीट का इतिहास-
आपको बता दें कि वर्ष २००९ से अमरावती लोकसभा सीट अनुसूचित जाति यानी एससी संवर्ग के लिए आरक्षित सीट है तथा अमरावती जिले की कुछ तहसीलें वर्धा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में आती है. जिनमें मोर्शी, वरुड, चांदुर रेलवे, और धामणगांव रेलवे शामिल है. शेष सभी तहसीलों का समावेश अमरावती संसदीय क्षेत्र में होता है. ६ विधानसभा सीटोंवाले अमरावती संसदीय सीट पर साल १९५१ में सबसे पहले आम चुनाव हुए थे, जिसे तत्कालीन कांग्रेस नेता डॉ. पंजाबराव उर्फ भाऊसाहब देशमुख ने जीता था. वे तीन बार इस सीट से कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित हुए तथा १९५१ से लेकर १९८४ तक यहां पर कांग्रेस का राज रहा. साल १९८० में पहली बार इस सीट से कांग्रेस से ऊषा चौधरी ने चुनाव लड़ा और वो जीतकर लोकसभा पहुंचीं. वे दो बार लगातार इस सीट पर सांसद रहीं.

वहीं साल १९८९ में यह सीट सीपीआय के नाम रहीं, जब यहां से माकपा के सुदामकाका देशमुख ने प्रचंड बहुमत के साथ विजय हासिल करते हुए इतिहास रच दिया था. वहीं १९९१ में पहली बार यहां से देश की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने चुनाव लड़ा था और वो संसद पहुंचीं. इसके बाद वर्ष १९९६ का चुनाव यहां पर शिवसेना ने जीता और सेना प्रत्याशि अनंत गुढे सांसद निर्वाचित हुए. इसके बाद १९९८ में हुए मध्यावधी चुनाव में यह सीट रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की ओर से स्व. रा.सु. उर्फ दादासाहब गवई ने जीती. लेकिन इसके एक साल बाद दोबारा हुए चुनाव में शिवसेना ने अपनी हार का बदला ले लिया और एकबार फिर अनंत गुढे अमरावती से सांसद निर्वाचित हुए. तब से ये सीट शिवसेना के ही पास है. वर्तमान समय में आनंदराव अड़सूल यहां से सांसद हैं.

आघाडी व युती फिर आमने-सामने
बता दें कि, विगत लंबे समय से कांग्रेस व राकांपा द्वारा आघाडी बनाकर तथा भाजपा व शिवसेना द्वारा युती बनाकर राज्य में लोकसभा व विधानसभा चुनाव लडे जा रहे है. जिसके तहत दोनों ही गठबंधनों द्वारा आपस में तालमेल करते हुए सीटों का बंटवारा किया जाता है. इसके तहत जिस तरह विगत लोकसभा चुनाव में अमरावती संसदीय सीट आघाडी के तहत राकांपा के और युती के तहत शिवसेना के कोटे में गयी थी. वहीं स्थिति इस बार भी बरकरार है. इसके तहत यह तो पूरी तरह स्पष्ट है कि, शिवसेना की ओर से इस बार भी सांसद आनंदराव अडसूल ही उम्मीदवार होंगे,

वहीं राकांपा की ओर से अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले गये है. हालांकि राकांपा प्रत्याशि के रूप में दिनेश बूब का नाम लगभग तय माना जा रहा है. ऐसे में इस बार के चुनाव में जहां शिवसेना के सामने अपनी सीट पर कब्जा बरकरार रखने की चुनौती है और सांसद आनंदराव अडसूल इस सीट पर जीत की हैट्रिक लगाने हेतु बेताब है. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस व राकांपा इस सीट को जीतकर अपना पुराना हिसाब किताब बराबर करने के साथ ही गत वैभव को प्राप्त करने हेतु बेताब है. ऐसे में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि, अमरावती की जनता अपने पुराने साथी को चुनती है या इस चुनाव में कुछ चौंकानेवाले परिणाम सामने आते हैं.

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