दादासाहब की रिपाइं का अस्तित्व खतरे में!


प्रतिनिधी / दि.१५ अमरावती – २०१९ के चुनाव में पहली बार दादासाहब गवई द्वारा स्थापित रिपाइं लोकसभा के चुनावी मैदान से बाहर हो गयी है. जिससे दादासाहब की रिपाइं का अस्तित्व खतरे में पडने की चर्चा राजनीतिक गलियारे में है. रिपाइं के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. राजेंद्र गवई ने इस बार लोकसभा चुनाव न लढऩे का ऐलान कर दिया है. बार-बार मिलनेवाली पराजय पार्टी को कमजोर करती है, यह दावा डॉ.गवई ने इस बार लोकसभा चुनाव न लढऩे की बात कहते किया. लेकिन वे भुल गये कि यह वहीं रिपाइं है जिसके संस्थापक स्व.रा.सु.गवई का कहना था कि चुनाव हार-जीत देखकर नहीं लढ़े जाते है. अपना अस्तित्व सिध्द करने की परीक्षा चुनाव रहता है. लेकिन आज दादासाहब के रिपाइं की जिम्मेदारी संभाल रहे डॉ.राजेंद्र गवई को चुनावी मैदान में उतरकर कड़ी टक्कर देने से ज्यादा चिंता चुनाव में हारने की है. तभी तो उन्होंने २ दशकों में पहली बार लोकसभा चुनाव में न उतरने का फैसला लिया है.

उन्होंने कहा कि रिपाइं, राष्ट्रवादी-कांग्रेस गठबंधन के साथ है व आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को इसका फायदा होगा और यही सोचकर उन्होंने इस बार २ कदम पीछे खिंच लिये है. रिपाइं के संस्थापक स्व.रा.सु. गवई ने १९९६ व उसके पहले तक हर चुनाव में अपना दमखम परखते हुए चुनावी मैदान में ताल ठोकी. रा.सु.गवई ने ६ चुनाव में से मात्र एक चुनाव जीता था. १९९८ के चुनाव में कांग्रेस व राष्ट्रवादी के समर्थन से स्व.रा.सु.गवई चुनाव जीते थे. उसके बाद डॉ.राजेंद्र गवई ने भी २ बार चुनाव मैदान में उतरकर स्वबल परखा, लेकिन उनके हाथ पराजय ही लगा. स्व.रा.सु.गवई कभी भी हारने का मलाल नहीं रखते थे, उनका कहना था कि चुनाव में पूरी ताकद से लढऩा ही पार्टी का दायित्व है. फिर जीत मिले या हार उसकी परवाह नहीं करनी चाहिये. लेकिन आज दादासाहब के रिपाइं का अस्तित्व खतरे में आ रहा है. अभी पार्टी की कमान संभाल रहे उनके पुत्र डॉ.राजेंद्र गवई का कहना है कि हर बार हारने के लिए चुनाव य्यो लढ़े. इसलिए वे इस बार के लोकसभा चुनाव में चुनावी मैदान से बाहर है. जानकारों का कहना है कि डॉ.राजेंद्र गवई ने रिपाइं को बढ़ाने के लिए कुछ ठोस नहीं किया.

दादासाहब रिपाइं को एक आंदोलन के रूप में चलाते थे. लेकिन अब रिपाइं का नेतृत्व जीत को देखकर अपने कदम उठाने लगा है. जानकारों का दावा है कि रिपाइं के जो अलग-अलग गुट है वे एक दूसरे गुट की जानकारियां रखकर अपने-अपने फैसले लेते है. इन दिनों सेना-भाजप व कांग्रेसराष्ट्रवादी इन बड़ी पार्टियों ने छोटे पक्षों का महत्व कम कर डाला है. इसके लिए संबंधित छोटे पक्ष भी उतने ही जिम्मेदार है. तभी तो रिपाइं का कवाडे, गवई, आठवले, भारिप यह गुट इन दिनों हाशियें पर है. कवाडे गुट का अस्तित्व खत्म होने जैसा है. भारिप भी वंचित बहुजन आघाडी में विलीन होने जा रहा है. रिपाइं के आठवले भाजपा के साथ है व गवई कांग्रेसराष्ट्रवादी के इन सभी गुटों का स्वतंत्र अस्तित्व व कैडर जनाधार है, लेकिन इन गुटों के नेताओं ने अपना स्वहित देखते हुए अपनी पार्टियों को कमजोर स्थिती में पहुंचा दिया है. जिसका खामियाजा भी इन छोटे पक्षों को उठाना पड़ रहा है. उसी का एक पुख्ता प्रमाण स्वरूप रिपाइं के गवई गुट को देखा जा रहा है, जो २ दशकों के बाद पहली बार लोकसभा चुनावी मैदान से बाहर है.

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