इस चुनाव में ढाई लाख मुस्लिम मतदाता उपेक्षा का शिकार!

प्रतिनिधि/दि.११ अमरावती-इससे पहले कहा जाता था कि, चुनाव की चहलपहल सबसे पहले मुस्लिमबहुल वोटों का झुकाव किस ओर रहेगा. किंतु अब तक चली आ रहीं परंपरा से बेहद विपरित इस बार अमरावती संसदीय क्षेत्र में मुस्लिम वोटों के संदर्भ में कहीं कोई चर्चा नहीं है. साथ ही चुनावी रेस में मौजूद प्रमुख प्रत्याशियों द्वारा भी संसदीय क्षेत्र में ढाई लाख से अधिक की संख्या में रहनेवाले मुस्लिम मतदाताओं की कोई पूछ-परख नहीं  की जा रही, यह अपने आप में बेहद हैरतअंंगेज बात है. यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि, देश के अल्पसंख्यक समाज, विशेषकरमुस्लिमों में इस समय मोदी विरोध की जबर्दस्त लहर चल रही है, जिसके चलते मुस्लिम तबके के बड़े नेता, बुध्दिजीवी तथा धर्मगुरू कहीं खुले तौर पर और कहीं दबी जुबान में पीएम मोदी की पार्टी व गठबंधन के प्रत्याशियों को हराने की अपील कर चुके है. इसके तहत कहा गया है कि, भाजपा के गठबंधनवाले प्रत्याशी के खिलाफ जो भी सशक्त प्रत्याशी हो, उसे मुस्लिम समाज द्वारा खुले तौर पर समर्थन दिया जाये.

इस अपील को कांग्रेस के नेतृत्ववाले महागठबंधन के लिए बेहद मुफीद मान लिया गया है और महागठबंधन के प्रत्याशियों सहित भाजपासेना के प्रत्याशियों को टक्कर दे सकने में सक्षम प्रत्याशियों द्वारा यह मानकर चला जा रहा है कि, मुस्लिम वोट बिना मांगे ही उनकी झोली में है. ऐसे में रेस में रहनेवाले प्रत्याशी इस समय मुस्लिम वोटों को अपनी बपौती मानकर चल रहे है और अपना पूरा ध्यान अन्य क्षेत्रों की ओर लगा रहे है. वहीं दूसरी ओर भाजपा के नेतृत्ववाले एनडीए गठबंधन के प्रत्याशी यह तय मानकर मुस्लिमबहुल क्षेत्रों की ओर कम ध्यान दे रहे हैं कि, मोदी विरोध की लहर के चलते उन्हेें वैसे भी मुस्लिम तबके के वोट नहीं मिलनेवाले. ऐसे में अपेक्षा की जा रही थी कि, अमरावती संसदीय क्षेत्र में भाजपा-शिवसेना युति के प्रत्याशी सांसद अडसूल के खिलाफ खम ठोंकनेवाले और खुद को जीत का सशक्त दावेदार बतानेवाले प्रत्याशियों द्वारा मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने और अपनी ओर आकर्षित करने के हरसंभव प्रयास किये जायेंगे. किंतु फिलहाल तो ऐसा कुछ होता दिखाई नहीं दे रहा. साथ ही जो स्थितियां बन रहीं है, वे विरोधाभास पैदा करने के साथ-साथ मुस्लिम मतदाताओं में जबर्दस्त संदेह व संभ्रम भी पैदा कर रही है.

सुनील शेट्टी, गोविंदा व रविना टंडन का रोड-शो भी नहीं

बता दें कि, विधायक रवि राणा हर बार अपने चुनाव प्रचार तथा युवा स्वाभिमान के सभी आयोजनों को तडक़-भडक का रंग देने हेतु फिल्मी सितारों को अमरावती बुलाते हैं, जिसके तहत इस बार नवनीत राणा के प्रचार हेतु फिल्म अभिनेता सुनील शेट्टी, अभिनेता व पूर्व सांसद गोविंदा तथा फिल्म अभिनेत्री रविना टंडन को अमरावती संसदीय क्षेत्र में प्रचार हेतु उतारा जा रहा है. इसके तहत सुनील शेट्टी को तिवसा, अचलपुर व मेलघाट क्षेत्र का दौरा कराया जायेगा. साथ ही फिल्म अभिनेता गोविंदा व अभिनेत्री रवीना टंडन की प्रमुख उपस्थिति में दशहरा मैदान पर जनसभा का आयोजन किया जा रहा है. किंतु इन तीनों में से किसी का भी मुस्लिम बहूल क्षेत्र में कोई रोड शो आयोजित नहीं किया गया है. यह भी अपने आप में बेहद उल्लेखनीय है.

मुस्लिमों को हिंदू इलाकों में प्रचार से भी रखा जा रहा दूर

इसके अलावा यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि, नवनीत राणा के हिंदू बहुल क्षेत्रों में होनेवाले प्रचार में शामिल होने से भी मुस्लिम नेताओं को रोका जा रहा है, ताकि हिंदू वोटों पर इसका असर न पडे. संभवत: इसी रणनीति के तहत नवनीत राणा के मुख्य प्रचार कार्यालय के उद्घाटन अवसर पर किसी बड़े मुस्लिम नेता, बुध्दिजीवी अथवा गणमान्य को मंच पर स्थान नहीं दिया गया और प्रचार कार्यालय के उद्घाटन अवसर पर आयोजित सभा में भी किसी बड़े मुस्लिम नाम या चेहरे को आमंत्रित नहीं किया गया. कम मतदान होने की भी आशंका ज्ञात रहें कि, हर चुनाव के समय मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में तुलनात्मक रूप से माहौल काफी गहमा-गहमीवाला रहता है. और कहा जाता है कि, चुनाव मुस्लिम बहुल इलाकों से ही गरम होना शुरू होते है.

किंतु इस बार अपेक्षा से विपरित मुस्लिम बहुल इलाकों में चुनावी माहौल और चुनाव बेहद ठंडे दिखाई दे रहे हैं और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कुछ एक स्थानों पर बैनर,पोस्टर लगाने के साथ ही इक्कादूक्का प्रचार वाहन घूम रहे हैं, जिससे इस लोकसभा चुनाव को लेकर मुस्लिम तबके में जबर्दस्त उदासीनता देखी जा रहीं है. अब प्रत्यक्ष मतदान में महज सात दिन और प्रचार खत्म होने में मात्र पांच दिन का समय शेष बचा है. बावजूद इसके मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में चुनाव को लेकर कोई उबाल नहीं है. ऐसे में इस बार जहां यह आशंका है कि, अपने मताधिकार का प्रयोग करनेवाले मुस्लिमों द्वारा ईवीएम मशीन पर ‘नोटा’ के पर्याय का प्रयोग किया जा सकता है, वहीं यह आशंका भी बन रहीं है कि, इस बार मुस्लिम मतदाताओं के मतदान का प्रतिशत ही बेहद कम रहे, य्योंकि क्षेत्र के मतदाता किसी भी एक प्रत्याशी को अपने लिये मुफीद नहीं मान रहे.

‘नोटा’ के पर्याय पर विचार कर सकते हैं मुस्लिम

इस चुनाव में अपने पास कोई सशक्त पर्याय उपलब्ध नहीं रहने तथा उपलब्ध पर्याय द्वारा अपनी अनदेखी किये जाने की वजह से मुस्लिम मतदाताओं में चुनाव को लेकर जबर्दस्त उदासीनता भी देखी जा रही है. साथ ही यह तबका अपने मताधिकार का प्रयोग करने से वंचित भी नहीं रहना चाहता. ऐसे में मुस्लिम समाज का मध्यम, उच्च मध्यम तथा बुध्दिजीवी तबका इस बार ‘नोटा’ पर्याय का प्रयोग करने के बारे में बड़ी संजीदगी के साथ सोच रहा है, ऐसा पता चला है. इस सोच के पीछे एक और सबसे बड़ी व प्रमुख वजह यह भी है कि, मुस्लिम समाज का एक बड़ा तबका अब तक विधायक राणा की राजनीतिक ईमानदारी पर पुरा भरोसा नहीं रख पा रहा है, य्योंकि विधायक रवि राणा अपने चुनाव प्रचार के दौरान शिवसेना के पार्टी प्रमुख उध्दव ठाकरे को तो जमकर निशाना बना रहे हैं. किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित राज्य के भाजपा नेता व मुख्यमंत्री देवेेंद्र फडणवीस के खिलाफ वे अपने मुंह से एक भी शब्द नहीं निकाल रहे, जबकि इन्हीं रवि राणा ने विगत लोकसभा चुनाव के दौरान मौलाना महमूद मदनी की प्रमुख उपस्थिति में डिप्टी ग्राऊंड पर आयोजित जनसभा में पीएम मोदी के खिलाफ जमकर आग उगली थी. वहीं इस बार विधायक राणा ने पीएम मोदी को लेकर रहस्यमय ढंग से चुप्पी साध रखी है. इसके चलते भी मुस्लिम समाज राणा की दावेदारी को संदेह की दृष्टि से देख रहा है.

 

 

शहर में ९० हजार व जिले में ढाई लाख से अधिक हैं मुस्लिम मतदाता

वर्ष २०११ की जनगणना के मुताबिक अमरावती जिले में मुस्लिमों की जनसंख्या का अनुपात १४.५६ फीसदी था, जो जनसंख्या के स्वाभाविक वृध्दिदर के चलते अब करीब १६ फीसदी के आसपास है. कुल जनसंख्या के इस अनुपात को देखते हुए मतदाताओं में भी मुस्लिमों की हिस्सेदारी १६ फीसदी के आसपास ग्राह्य मानी जा सकती है. ऐसे में कहा जा सकता है कि, जिले के कुल १८ लाख मतदाताओं में मुस्लिम मतदाता १६प्रतिशत के हिसाब से करीब २ लाख ८८ हजार के आसपास है. जिसमें से ९० हजार मुस्लिम मतदाता अमरावती शहर में ही रहते हैं. उल्लेखनीय है कि हर चुनाव में मुस्लिमों को पार्टी विशेष का गठ्ठा वोट या वोट बैंक माना जाता रहा है. साथ ही इस बार तो मुस्लिम समाज में मोदी विरोध की लहर जबर्दस्त ढंग से मौजूद है और पीएम मोदी के नाम को लेेकर राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे विरोध के चलते यह तय माना जा रहा है कि, अन्य क्षेत्रों की तरह जिले के मुस्लिम मतदाता अमरावती संसदीय क्षेत्र में भाजपा-शिवसेना युति प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करेंगे.

हालांकि इस बार मुस्लिम मतदाता किस प्रत्याशी के पक्ष में अपना मन बना चुके हैं, यह चित्र अभी स्पष्ट नहीं हुआ है. किंतु फिर भी राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तर पर दिखाई दे रहे परिदृश्य एवं अमरावती संसदीय क्षेत्र के हालात को देखकर कहा जा सकता है कि, अमरावती में मुस्लिम मतदाता संभवत: कांग्रेस-राकांपा महागठबंधन द्वारा समर्थन प्राप्त निर्दलीय प्रत्याशी नवनीत राणा के पक्ष में मतदान कर सकते हैं, य्योंकि मौजूदा सांसद व भाजपा-सेना युति प्रत्याशी आनंदराव अडसूल के सामने इस समय नवनीत राणा की दावेदारी को काफी हद तक सशक्त माना जा रहा है.

प्रचार बूथ नहीं, प्रचार साहित्य भी नहीं
किंतु वहीं दूसरी ओर यह अपने-आप में बेहद हैरतअंगेज बात है कि, मुस्लिम मतदाताओं का स्वाभाविक समर्थन प्राप्त अमरावती संसदीय क्षेत्र के प्रमुख प्रत्याशियों में शामिल नवनीतकौर राणा तथा उनके पति व विधायक रवि राणा द्वारा मुस्लिम मतदाताओं को उतनी तवज्जो नहीं दी जा रही, जितनी दी जानी चाहिए. साथ ही राणा द्वारा मुस्लिमों से एक हद तक दूरी भी बनाकर रखी जा रहीं है, ऐसा संभवत: इसलिए है कि, कहीं मुस्लिमों से नजदीकी साधने के चक्कर में नवनीत राणा को मिलनेवाले हिंदू वोट न बिखर जायें. संभवत: राणा द्वारा यह मानकर चला जा रहा है कि, उनके मुस्लिम वोट तो मोदी विरोध के चलते कहीं नहीं जानेवाले और उन्हें फिलहाल बहुसंख्यक आबादी के वोटों को साधने पर अपना पूरा ध्यान केंद्रीत करना है.

शायद इसी सोच के चलते अब तक मुस्लिम बहुल क्षेत्र में एक भी प्रचार सभा या पदयात्रा का आयोजन नहीं किया गया. पता तो यहां तक चला है कि, कुछ राणा समर्थक मुस्लिम नेताओं ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों नवनीत राणा की प्रचार सभा मांगी थी. किंतुउन्हें सभा हेतु समय देने से इन्कार कर दिया गया. साथ ही पठाण चौक पर केवल औपचारिकता के लिए एक प्रचार बूथ खोला गया है. पता तो यह भी चला है कि, खुद को प्रमुख प्रत्याशी बतानेवाले राणा दम्पत्ति द्वारा मुस्लिम बहुल इलाकों में चुनाव प्रचार खर्च के मामले में भी अपना हाथ तंग रखा जा रहा है. जिसके तहत मुस्लिम बहुल क्षेत्र के समर्थक यह शिकायत कर रहे हैं कि, वे तो मोदी के खिलाफ राणा का प्रचार करना चाहते हैं. किंतु उन्हेें आवश्यक प्रचार सामग्री, बैनर, पोस्टर व प्रचार वाहन ही उपलब्ध नहीं कराये जा रहे.

इस बार किसी बड़े मुस्लिम नेता का दौरा नहीं

यहां भी विशेष उल्लेखनीय है कि, वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनाव में नवनीतकौर राणा जब राकांपा की अधिकृत प्रत्याशी थी, तब उनके प्रचार के लिए अमरावती में जमीयत उलेमा के सदर व पुर्व राज्यसभा सदस्य मौलाना महमूद मदनी सहित राकांपा नेता नवाब मलिक व मुनाफ हकीम जैसे बड़े नेता प्रचार हेतु अमरावती आये थे. किंतु इस बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहीं नवनीत राणा के प्रचार हेतु बनायी गयी स्टार प्रचारकों की सूची में किसी बड़े मुस्लिम नेता का नाम शामिल नहीं है. जबकि नवनीत राणा को कांग्रेस व राकांपा गठबंधन का समर्थन प्राप्त है और इस गठबंधन को समूचे देश में मुस्लिम तबके की ओर से समर्थन दिया जा रहा है. यहां यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि विगत दिनों राज्य अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष मुनाफ पटेल अमरावती आये थे. जिनका एक स्थानीय न्यूज चैनल पर साक्षात्कार भी प्रसारित हुआ था. किंतु प्रमुख प्रत्याशी होने का दावा करनेवाले राणा द्वारा मुनाफ पटेल की भी सभा मुस्लिम बहुल क्षेत्र में नहीं ली गयी. जबकि इस समय अल्प व अत्यल्प जनसंख्या रहनेवाले गांवों तक राणा द्वारा अपनी पहुंच बनायी जा रही है और छोटे-छोटे आठ-दस गांवों को मिलाकर किसी एक बडे गांव में नवनीत राणा की प्रचार सभा आयोजित की जा रही है. ऐसे में शहर सहित जिले में बहुतायत में रहनेवाले मुस्लिम मतदाताओं की अनदेखी पूरी तरह से समझ से परे है.

अपने वोटों का बंटवारा नहीं चाहते मुस्लिम, किंतु अब तक हैं संभ्रम में

उल्लेखनीय है कि विगत पांच वर्षों तक लगातार गौहत्या, मॉब लिंचिंग तथा राम मंदिर जैसे मसलों को खूब हवा दी गयी, जिससे मुस्लिमों में मोदी सरकार को लेकर अविश्वास और असुरक्षा की भावना पैदा हुई और वे पीएम मोदी के और भी अधिक खिलाफ हो गये. ज्ञात रहे कि, मुस्लिम समाज वैसे भी वर्ष २००२ में गोधरा कांड के बाद हुए गुजरात दंगों के चलते नरेंद्र मोदी के विरोधी रहे हैं तथा विगत पांच वर्ष के दौरान मोदीविरोध की यह लहर और अधिक तीव्र हुई है. किंतु मोदी के खिलाफ कौन, इस सवाल का उत्तर मुस्लिम मतदाता अब भी तलाश रहे हैं और मुस्लिमों द्वारा सीधा-सीधा फैसला लिया गया है कि, मोदी की पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ जो भी प्रत्याशी ताकतवर दिखाई दे, उसका सीधे तौर पर समर्थन किया जाये. इस रणनीति के तहत मुस्लिम तबका अपने वोटों का बंटवारा नहीं चाहता है. शायद यही वजह है कि, हर बार मुस्लिमों, विशेषकर मुस्लिम युवाओं की जबर्दस्त भीड़ खींचनेवाले एमआईएम अध्यक्ष सांसद असदउद्दीन ओवैसी को सुनने तक कोई उपस्थित नहीं हुआ.

लगभग यही हाल सपा नेता अबू आझमी की सभा का भी हुआ. जहां पर भीड़ जुटाने के लिए कव्वाली का सहारा लेना पड़ा था. जिससे यह तय हो गया था कि, इस बार मुस्लिम मतदाता किसी भी हाल में सपा-बसपा गठबंधन तथा वंचित बहुजन आघाडी के साथ तो खड़े दिखाई नहीं दे रहे. ऐसे में भाजपा-सेना युति के साथ किसी भी कीमत पर नहीं जानेवाले मुस्लिम मतदाताओं के पास ले-देकर कांग्रेस-राकांपा महागठबंधन का समर्थन प्राप्त निर्दलीय प्रत्याशी नवनीत राणा के पक्ष में मतदान करने का पर्याय ही शेष बचता है. संभवत: मुस्लिमों की इसी मजबूरी को भांपकर संबंधित प्रत्याशी द्वारा मुस्लिम वोटों को अपनी बपौती मान लिया गया है और फिलहाल अपना ध्यान मुस्लिम बहुल क्षेत्रों व मुस्लिम वोटों की बजाय हिंदूबहूल क्षेत्रों व बहुसंख्यक हिंदू वोटों पर दिया जा रहा है. जिसके चलते हर चुनाव के समय चुनावी चहल-पहल से भरे रहनेवाले मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में इस चुनाव के समय जबर्दस्त सन्नाटा दिखायी दे रहा है. जहां पर न तो किसी पार्टी का प्रचार बूथ ही है और न ही मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में प्रचार वाहनों का शोरगुल ही सुनायी दे रहा है.

‘बडे घर’ व ‘छोटे घर’ सहित मुस्लिम जनप्रतिनिधियों की भी अनदेखी

बता दें कि, अमरावती शहर सहित जिले में होनेवाले हर चुनाव में मुस्लिम तबका ‘दो बंगले’, ‘बड़े घर’ व ‘छोटे घर’ आदि में होनेवाले फैसलों की राह देखता है. साथ ही साथ स्थानीय निकायों में बतौर सदस्य चुने गये मुस्लिम समाज के जनप्रतिनिधि भी सभी चुनाव में अपने प्रत्याशियों के लिए मतदाताओं के बीच प्रचार करते है. इस समय अमरावती मनपा में मुस्लिम समाज से कांग्रेस के ६, एमआईएम के ११ तथा बसपा के २ सदस्य है. किंतु अब तक रेस में खुद को प्रमुख दावेदार के रूप में प्रचारित कर रहे राणा दम्पत्ति द्वारा इनमेें से किसी की भी कोई सुध नहीं ली गयी. ऐसे में जिले के आम मतदाता एक-दो दिन में होनेवाली ‘बड़े लोगों’ की बैठक का इंतजार कर रहा है, जिसके बाद मुस्लिम मतदाताओं द्वारा अपने मताधिकार के प्रयोग को लेकर कोई अंतिम निर्णय लिया जा सकता है.

ऐसी है अमरावती में धर्मनिहाय जनसंख्या

वर्ष २०११ में हुई जनगणना के मुताबिक अमरावती जिले की कुल जनसंख्या (केवल मतदाता नहीं) २९ लाख के आसपास है. जिसमें से ७० फीसदी जनसंख्या अलग-अलग जातियों व उपजातियों में बंटे हिंदूधर्मियों की है, जो करीब २१ लाख के आसपास है. वहीं दूसरी ओर जिले में मुस्लिमों की तादाद ४ लाख २१ हजार ४१०, क्रिश्चियन की तादाद ७ हजार २२३, सिखों की जनसंख्या २ हजार २४२, बौध्दों की जनसंख्या ३ लाख ८३ हजार ८९१ तथा जैन धर्मियों की जनसंख्या ११ हजार ३६० थी. इस जनसंख्या में स्वाभाविक व प्राकृतिक दरवृध्दि के चलते वर्ष २०१९ तक निश्चित तौर पर इजाफा हुआ होगा. साथ ही यहां यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि, उपरोक्त आंकडे कुल जनसंख्या के हैं, जिसमें से मताधिकार प्राप्त मतदाताओं की संख्या अलग से निकाली जानी है. हालांकि मतदाताओं का प्रतिशत भी लगभग इसी अनुपात में होगा, ऐसा कहा जा सकता है. इसके अलावा धामणगांव तथा मोर्शी व वरूड़ तहसीलों के वर्धा संसदीय क्षेत्र में शामिल रहने की वजह से इन क्षेत्रों की जनसंख्या व मतदाता संख्या अमरावती संसदीय क्षेत्र में शामिल नहीं होती. ऐसे में अनुसूृचित जाति संवर्ग हेतु आरक्षित अमरावती संसदीय क्षेत्र में फिलहाल प्रमुख प्रत्याशियों सहित सभी प्रत्याशियों द्वारा बहुसंख्यक आबादी के वोटों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि इस बार चुनावी वैतरणी को आसानी से पार किया जा सके.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *